कश्मीरी पंडित विस्थापन: 36 साल बाद भी न्याय और घर वापसी का इंतज़ार
30 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडित न्याय, सुरक्षा और अपने घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कश्मीरी पंडित विस्थापन भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। 1990 के दशक में आतंक और धमकियों के कारण लाखों कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी। 36 साल बाद भी यह समुदाय न्याय, सुरक्षा और सम्मानजनक घर वापसी का इंतज़ार कर रहा है।
कश्मीर फाइल्स फिल्म के रिलीज़ होने के बाद कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचारों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस फिल्म ने उन जख्मों को फिर से हरा कर दिया है, जो पिछले तीन दशकों से कश्मीरी पंडित अपने दिल में दबाए हुए हैं।
दैनिक भास्कर की टीम ने श्रीनगर, पुलवामा, शोपियां, अनंतनाग सहित एक दर्जन से अधिक गांवों में जाकर कश्मीरी पंडित परिवारों से बात की और उनके आज के हालात को जाना।
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घाटी में अब भी डटे हैं कुछ परिवार
कश्मीर की फितरत मौसम की तरह है—कब हालात बिगड़ जाएं, कहना मुश्किल है। बावजूद इसके, घाटी में आज भी करीब 900 कश्मीरी पंडित परिवार रह रहे हैं। ये वे परिवार हैं, जिन्होंने 1990 के सबसे खतरनाक दौर में भी कश्मीर छोड़ने से इनकार कर दिया।
दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के मट्टन इलाके में आज भी दर्जनों वीरान मकान पलायन की गवाही देते हैं। यहां खड़ी दो से पांच मंज़िला हवेलियां उस समय की सामाजिक हैसियत को दिखाती हैं। इसी इलाके में एक नया घर बन रहा है। पड़ोसियों ने बताया कि यह एक कश्मीरी पंडित परिवार का घर है, जो छह महीने पहले ही वापस लौटा है।
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“जन्मभूमि छोड़कर कहां जाएं?”
घर लौटे कश्मीरी पंडित, जिन्हें पड़ोसी प्यार से काकाजी कहते हैं, बताते हैं—
“सरकारी नौकरी के कारण बाहर रहे, लेकिन रिटायरमेंट के बाद वापस लौट आए। जन्मभूमि छोड़कर कोई कब तक बाहर रहेगा? यहां हमारे मुस्लिम पड़ोसी ही हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं।”
वे कहते हैं कि सुख-दुख में सबसे पहले यही पड़ोसी साथ खड़े होते हैं। इसी बस्ती में ऐसे चार-पांच पंडित परिवार हैं, जिन्होंने 1990 के खौफनाक दौर में भी घाटी नहीं छोड़ी।
इंसानियत आज भी ज़िंदा है
इन्हीं परिवारों में से एक सरकारी कर्मचारी बताते हैं—
“90 के दशक में मैं बहुत छोटा था। डर का माहौल था, लेकिन बुजुर्गों ने यहीं रहने का फैसला किया। पिछले साल पिता की बीमारी के समय एक मुस्लिम पड़ोसी ने बिना मांगे 50 हजार रुपए सामने रख दिए।”
हालांकि इलाज के बाद भी पिता को बचाया नहीं जा सका, लेकिन अंतिम संस्कार में भी वही पड़ोसी परिवार के साथ खड़ा रहा।
टेंट से फिर घर तक का सफर
पुलवामा जिले के एक गांव में बिंदु (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि आतंक के समय उनका परिवार रातों-रात आलीशान घर छोड़कर जम्मू के टेंट कैंप पहुंच गया था। तीन साल तक टिनशेड में रहकर पढ़ाई की।
“शादी के बाद जब घाटी लौटी तो बहुत डर लगता था। बिंदी-सिंदूर तक नहीं लगाती थी। धीरे-धीरे हालात कुछ बेहतर हुए,” बिंदु कहती हैं।
वे बताती हैं कि उनके भाई आज एयरफोर्स में हैं और बहन को सरकारी नौकरी मिली, लेकिन खुद वे माइग्रेंट का दर्जा छिनने के बाद निजी स्कूल में पढ़ाने को मजबूर हैं।
न्याय और सुरक्षा की मांग
घाटी में कश्मीरी पंडितों को न्याय दिलाने की मांग फिर तेज़ हो गई है। जम्मू-कश्मीर रिकॉन्सिलिएशन फ्रंट के चेयरमैन डॉ. संदीप मावा ने लाल चौक पर प्रदर्शन कर दोषियों को सज़ा देने की मांग की।
उनकी दो प्रमुख मांगें हैं—
- कश्मीरी पंडितों के हत्यारों को कड़ी सज़ा
- निष्पक्ष जांच के लिए एसआईटी या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच
इंतज़ार अब भी जारी
30 साल बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडित सिर्फ एक ही बात चाहते हैं—
सुरक्षा, सम्मान और अपने घर लौटने का अधिकार।